हिंदी कविता के आकाश में रामधारी सिंह 'दिनकर' (1908–1974) उस सूर्य की भाँति उदित हुए जिसका प्रकाश एक साथ दो दिशाओं में फैला — एक ओर परतंत्र भारत की पीड़ा और विद्रोह की धधकती ज्वाला, दूसरी ओर मनुष्य के भीतर सुलगता शाश्वत प्रश्न। उन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि अकारण नहीं मिली। उनकी लेखनी जब उठी, तो उसमें असि की धार भी थी और दीप की कोमल लौ भी। यह संकलन उनके राष्ट्रीय और दार्शनिक — दोनों स्वरों का अनुशीलन है, उन प्रमुख कृतियों के माध्यम से जिन्होंने हिंदी काव्य की दिशा मोड़ दी। प्रत्येक कृति से अनेक प्रतिनिधि पद्यांश यहाँ संकलित हैं — मूल देवनागरी, उसका रोमन लिप्यंतरण (IAST), और अंग्रेज़ी भावार्थ सहित — ताकि उस महाकवि के वाङ्मय का वास्तविक विस्तार और तेवर पाठक तक पहुँचे।
दिनकर के काव्य को समझने की कुंजी यह है कि उनमें दो विरोधी प्रतीत होने वाली प्रवृत्तियाँ वस्तुतः एक ही मूल से उपजती हैं। एक ओर ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रांति की पुकार है; दूसरी ओर कोमल शृंगारिक भावनाओं की सूक्ष्म अभिव्यक्ति। इन दोनों प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष क्रमशः 'कुरुक्षेत्र' और 'उर्वशी' में दिखाई देता है। किंतु यह विरोध ऊपरी है — दोनों के मूल में मनुष्य की मुक्ति की वही अदम्य आकांक्षा है, जो कभी राष्ट्र के स्तर पर परतंत्रता के विरुद्ध फूटती है, तो कभी व्यक्ति के स्तर पर देह और आत्मा के द्वंद्व में। इसीलिए दिनकर को किसी एक खाँचे में रखना — चाहे 'वीर रस का कवि', चाहे 'राष्ट्रवादी कवि' — उनके साथ अन्याय है।
जीवन की पृष्ठभूमि: सिमरिया से संसद तक
बिहार के मुंगेर ज़िले के सिमरिया गाँव में 23 सितंबर 1908 को जन्मे दिनकर का बाल्यकाल अभाव और संघर्ष में बीता। पिता रवि सिंह का देहांत तब हुआ जब वे केवल दो वर्ष के थे; माता मनरूप देवी ने कठिनाइयों के बीच उनका पालन-पोषण किया। यह आरंभिक संघर्ष उनकी कविता में बार-बार लौटता है — शोषित के प्रति सहानुभूति और अन्यायी सत्ता के विरुद्ध आक्रोश के रूप में।
पटना विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक होने के पश्चात वे अध्यापन, फिर शासकीय सेवा और अंततः राज्यसभा के सदस्य के रूप में सार्वजनिक जीवन में आए। किंतु पद और प्रतिष्ठा ने उनकी लेखनी को कभी दुर्बल नहीं किया। स्वाधीनता से पूर्व उनकी रचनाएँ ब्रिटिश सत्ता के लिए चुनौती थीं — अंग्रेज़ प्रशासन को शीघ्र ही यह बोध हो गया कि वे एक 'विद्रोही' को अपने तंत्र का अंग बना बैठे हैं, और चार वर्षों में बाईस बार उनका स्थानांतरण किया गया। स्वाधीनता के पश्चात वे सत्ता के पतन और जनता के साथ विश्वासघात के विरुद्ध उतनी ही निर्भीकता से लिखते रहे। यही निरंतरता उन्हें केवल एक 'युग का कवि' नहीं, बल्कि एक स्थायी राष्ट्रीय विवेक बनाती है।
इतिहास के अध्येता होने का गहरा प्रभाव उनके समस्त काव्य पर दिखाई देता है। वे भूतकाल को केवल अतीत की भाँति नहीं देखते; उनके लिए महाभारत के कर्ण और कृष्ण, परशुराम और भीष्म — ये सब वर्तमान के प्रश्नों के उत्तर खोजने के माध्यम हैं। पौराणिक और ऐतिहासिक आख्यानों को समकालीन संदर्भ में पुनर्व्याख्यायित करने की यह कुशलता दिनकर की सबसे बड़ी मौलिकता है। वे अतीत से वर्तमान की ओर एक सेतु बनाते हैं, जिस पर चलकर पाठक अपने युग के संकटों को एक व्यापक नैतिक परिप्रेक्ष्य में देख पाता है।
एक प्रगतिवादी और मानवतावादी कवि के रूप में दिनकर ने सामाजिक तथा आर्थिक समानता और शोषण के विरुद्ध निरंतर लेखनी चलाई। उनका मानवतावाद किसी विदेशी विचारधारा से उधार नहीं लिया गया था; वह भारतीय परंपरा की उस गहन धारा से उपजा था जो मनुष्य की गरिमा को सर्वोपरि मानती है। यही कारण है कि उनकी क्रांति-चेतना और उनकी सांस्कृतिक आस्था के बीच कोई विरोध नहीं — दोनों एक ही जीवन-दृष्टि के दो पक्ष हैं।
विद्रोह का उद्गम: 'रेणुका' और 'हुंकार'
दिनकर की काव्य-यात्रा का आरंभिक और सर्वाधिक प्रभावशाली चरण उनके ओजस्वी, क्रांतिकारी काव्य का है। रेणुका (1935) और हुंकार (1938) वे संग्रह हैं जिन्होंने उन्हें राष्ट्रीय जागरण का कवि बना दिया। एक ओर गांधी का अहिंसक आंदोलन था, पर युवा हृदयों में क्रांति-चेतना भी धधक रही थी। दिनकर इसी दूसरी धारा के स्वर बने।
'हुंकार' की कविताओं में एक ऐसा आक्रोश है जो दीन-हीन और शोषित को संबोधित करता है, उसे उसकी अपनी शक्ति का बोध कराता है। यहाँ कवि सर्वहारा की मुट्ठी बँधवाता है, उसे सिंहासन की ओर बढ़ने का आह्वान देता है:
इसी संग्रह में भूख और सामाजिक विषमता का मर्मस्पर्शी चित्रण है। 'दूध-दूध' की वह पुकार, जिसमें अभावग्रस्त शिशु की चीख और स्वर्ग तक को चुनौती देने का संकल्प एक साथ ध्वनित होता है:
दिनकर का समूचा राष्ट्रीय काव्य इसी एक संकल्प के विविध रूप हैं — शक्ति का स्थानांतरण ऊपर से नीचे की ओर, विशिष्ट से सामान्य की ओर। उनका सर्वहारा दया का पात्र नहीं; वह इतिहास का कर्ता है।
'कुरुक्षेत्र': युद्ध और शांति का महाकाव्य
1946 में प्रकाशित कुरुक्षेत्र दिनकर की प्रतिभा का वह शिखर है जहाँ राष्ट्रीय कवि और चिंतक एक साथ मिलते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका की पृष्ठभूमि में रची गई यह कृति महाभारत के शरशय्या-प्रसंग को आधार बनाती है, जहाँ भीष्म युधिष्ठिर को युद्ध, धर्म, हिंसा और शांति का उपदेश देते हैं। यह वस्तुतः महाभारत के शांति-पर्व का काव्यरूप है, और इसे 'आधुनिक युग की गीता' कहा गया है।
इस कृति की केंद्रीय बेचैनी यह है — क्या हिंसा सर्वथा त्याज्य है? दिनकर का उत्तर सरल शांतिवाद नहीं। वे कहते हैं कि अन्याय के समक्ष की गई कायरतापूर्ण शांति, हिंसा से भी अधिक घातक है। शांति तभी सार्थक है जब वह भय से नहीं, बल्कि शक्ति और न्याय से उपजे। इसी कृति की वह पंक्ति, जो दिनकर के नैतिक दर्शन की कुंजी है:
यह पंक्ति भारतीय राजनीति को एक चेतावनी भी है — आत्मरक्षा की क्षमता के बिना शांति का उपदेश आत्मघाती है। शक्तिहीन की क्षमा विवशता है, गुण नहीं। दिनकर यहाँ गांधीवादी अहिंसा का सीधा खंडन नहीं करते, बल्कि उसे एक शर्त के साथ स्वीकार करते हैं — अहिंसा तभी सद्गुण है जब वह सामर्थ्यवान का स्वैच्छिक संयम हो, दुर्बल की विवशता नहीं।
'कुरुक्षेत्र' की गहराई इस तथ्य में है कि वह किसी एक पक्ष का सरल समर्थन नहीं करती। भीष्म के उपदेश के माध्यम से दिनकर युद्ध की भयावहता को भी पूरी निर्ममता से चित्रित करते हैं और शांति की आकांक्षा को भी सम्मान देते हैं। यहाँ कवि उस छद्म-शांति का तीव्र खंडन करता है जो वस्तुतः शोषण की श्रृंखला को बनाए रखने का साधन मात्र है:
किंतु 'कुरुक्षेत्र' का अंतिम स्वर हिंसा का महिमामंडन नहीं। युद्ध के विध्वंस के पश्चात भीष्म कर्म, पुरुषार्थ और मानवता की सेवा को ही सच्चा धर्म घोषित करते हैं। वे वैराग्य और पलायन का खंडन करते हुए कर्ममय जीवन को मोक्ष से श्रेष्ठ बताते हैं:
यह कर्मवाद ही 'कुरुक्षेत्र' का मूल संदेश है। निष्कर्ष यह नहीं कि युद्ध श्रेयस्कर है, बल्कि यह कि न्याय की रक्षा के लिए जब समस्त शांतिपूर्ण उपाय विफल हो जाएँ, तब प्रतिकार अनिवार्य हो जाता है — और उसके पश्चात भी मनुष्य का वास्तविक धर्म निवृत्ति नहीं, सक्रिय कर्म और लोक-सेवा है। यह विवेक 'कुरुक्षेत्र' को राष्ट्रीय आत्मबल और दार्शनिक गहराई का दुर्लभ संगम बनाता है।
'रश्मिरथी': कर्ण के बहाने न्याय का प्रश्न
दिनकर की किसी एक कृति को यदि सर्वाधिक लोकप्रियता मिली, तो वह रश्मिरथी (1952) है। 'रश्मिरथी' अर्थात 'सूर्य के रथ पर सवार' — यह महाभारत के कर्ण की गाथा है। किंतु दिनकर के लिए कर्ण केवल एक पौराणिक पात्र नहीं; वह सामाजिक अन्याय का प्रतीक है — वह व्यक्ति जिसे जन्म और जाति के आधार पर उसके अधिकारों से वंचित किया गया। सूतपुत्र कहकर तिरस्कृत कर्ण के माध्यम से दिनकर उस सामाजिक क्रूरता पर प्रहार करते हैं जो योग्यता को जन्म के नीचे दबा देती है।
इस अर्थ में 'रश्मिरथी' एक राष्ट्रीय कृति है — यह उस समतामूलक समाज का स्वप्न देखती है जहाँ मनुष्य का मूल्य उसके कर्म से आँका जाए, कुल से नहीं। कर्ण की वाणी में स्वयं कवि का यह स्वप्न मुखर होता है — एक नई मानवता की स्थापना का संकल्प। दिनकर के लिए कर्ण-चरित का उद्धार वस्तुतः उस सामाजिक क्रांति की घोषणा है जिसमें आगे चलकर मनुष्य केवल उसी पद का अधिकारी होगा जो उसके अपने सामर्थ्य से अर्जित हो — माता-पिता या वंश की देन से नहीं। जाति और जन्म का अहंकार विदा हो, और योग्यता ही एकमात्र कसौटी बने — यही 'रश्मिरथी' का सामाजिक स्वप्न है।
इस कृति का सर्वाधिक प्रसिद्ध सर्ग 'कृष्ण की चेतावनी' है, जहाँ शांतिदूत बनकर गए कृष्ण दुर्योधन के अहंकार के समक्ष पहले संधि का अंतिम प्रस्ताव रखते हैं:
जब दुर्योधन इस उदार प्रस्ताव को भी ठुकराकर शांतिदूत कृष्ण को ही बंदी बनाने का दुस्साहस करता है, तब कवि मानव-स्वभाव का वह शाश्वत सत्य उद्घाटित करता है जो इतिहास और राजनीति, दोनों पर समान रूप से लागू होता है:
विनाश बाहर से नहीं आता; वह भीतर विवेक के क्षय से आरंभ होता है। दुर्योधन का पतन उसके अहंकार में पहले ही लिखा जा चुका था। इसी सर्ग में दिनकर पुरुषार्थ का वह उद्घोष भी करते हैं जो पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-वाक्य बन गया — कि मनुष्य जब अपना समूचा बल लगाता है, तब असंभव भी संभव हो उठता है:
'जनतंत्र का जन्म': जनता का राज्याभिषेक
स्वाधीनता-प्राप्ति के क्षण को दिनकर ने जिस कविता में अमर किया, वह 'कुरुक्षेत्र' से संबद्ध वह प्रसिद्ध अंश है जिसे 'जनतंत्र का जन्म' के नाम से जाना जाता है। यह लोकतंत्र की स्थापना का उद्घोष है — सत्ता का राजाओं और विशिष्टजनों से छिनकर साधारण जन के हाथों में आना। इसकी एक पंक्ति भारतीय जनमानस में मुहावरे की तरह बस गई है:
इस एक पंक्ति में लोकतंत्र का समूचा दर्शन सिमट आया है। 'सिंहासन' राजतंत्र, सामंतवाद और प्रत्येक विशेषाधिकार-व्यवस्था का प्रतीक है; 'जनता' वह शक्ति है जो अब अपना अधिकार माँगने नहीं, ग्रहण करने आ रही है।
किंतु इस कविता का सौंदर्य केवल इस उद्घोष-पंक्ति तक सीमित नहीं। दिनकर पहले उस जनता का मार्मिक चित्र खींचते हैं जिसे सदियों तक मूक, अबोध और तुच्छ समझा गया — वह जनता जो असह्य पीड़ा सहकर भी कभी मुँह नहीं खोलती थी:
फिर कवि उसी मूक जनता को इतिहास का देवता घोषित करता है — और यह घोषणा भारतीय लोकतंत्र की सबसे क्रांतिकारी पुनर्परिभाषा है। दिनकर के देवता मंदिरों और राजमहलों में नहीं, बल्कि श्रम करते हुए किसान और मज़दूर में बसते हैं:
दिनकर इसमें किसान और श्रमिक — मिट्टी से जुड़े मनुष्य — को इतिहास का वास्तविक नायक घोषित करते हैं। फावड़े और हल अब राजदंड बनने को हैं; श्रम की धूसरता ही अब स्वर्ण-शृंगार है। यही कारण है कि यह कविता आगे चलकर हर जन-आंदोलन का नाद बनी, जो इसकी कालजयी शक्ति का प्रमाण है।
'परशुराम की प्रतीक्षा': पराजय के बाद का आत्ममंथन
1962 के भारत-चीन युद्ध की पराजय ने राष्ट्र को आमूल झकझोर दिया। इस आघात की प्रतिक्रिया में दिनकर ने परशुराम की प्रतीक्षा (1963) रची। स्वाधीनता के पश्चात जिस आत्मविस्मृति और दुर्बलता में राष्ट्र फिसल गया था, यह कृति उसके विरुद्ध एक तीव्र पुकार है। परशुराम — अन्यायी सत्ता के संहारक — का आह्वान वस्तुतः राष्ट्रीय पराक्रम और आत्मगौरव के पुनर्जागरण का आह्वान है।
इस संग्रह में दिनकर का स्वर पहले से कहीं अधिक तीक्ष्ण और बेचैन है। वे शस्त्र और शौर्य की उपेक्षा करने वाली उस मनोवृत्ति पर सीधा प्रहार करते हैं जो वीरता को हिंसा मानकर त्याग देती है:
इसी संग्रह की एक अन्य प्रसिद्ध रचना 'समर शेष है' में दिनकर तटस्थता को ही सबसे बड़ा अपराध घोषित करते हैं। यह पंक्ति भारतीय राजनीतिक चेतना का स्थायी सूत्र बन गई — कि अन्याय होते देखकर भी मौन रहने वाला उतना ही दोषी है जितना अन्याय करने वाला:
यह उद्घोष किसी एक युद्ध तक सीमित नहीं। 'समर शेष है' की पुनरावृत्ति में दिनकर यह स्थापित करते हैं कि स्वाधीनता-प्राप्ति युद्ध का अंत नहीं, आरंभ है — असमानता, शोषण और अन्याय के विरुद्ध संग्राम अभी शेष है। किंतु यह कृति केवल बाहरी शत्रु पर केंद्रित नहीं। इसका सर्वाधिक मार्मिक स्वर वह आत्म-निरीक्षण है जिसमें कवि पराजय का वास्तविक कारण बाहर नहीं, राष्ट्र के अपने भीतर खोजता है — अन्याय, प्रमाद और नेतृत्व की दुर्बलता में:
'परशुराम की प्रतीक्षा' इस अर्थ में एक राष्ट्रीय अंतःकरण की चीख है — आत्मसंतोष और प्रमाद के विरुद्ध, और सजग पराक्रम के पक्ष में। यह उस पीढ़ी से उत्तर माँगती है जिसने स्वाधीनता तो पाई, पर उसका मोल भूल गई।
चिंतन की ओर: 'उर्वशी' और अंतःकरण का द्वंद्व
दिनकर को केवल 'ओज का कवि' मान लेना उनके साथ अन्याय होगा। उनकी काव्य-यात्रा का परिपक्वतम फल है उर्वशी (1961) — वह काम-अध्यात्मपरक महाकाव्य जिसके लिए उन्हें 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। पुरूरवा और उर्वशी की पौराणिक कथा के माध्यम से दिनकर यहाँ मनुष्य की उस शाश्वत बेचैनी को स्वर देते हैं जो देह और आत्मा, भोग और मुक्ति, क्षण और शाश्वत के बीच निरंतर झूलती रहती है।
यहाँ कवि का तेवर रूपांतरित हो जाता है — असि के स्थान पर अब अंतःकरण की वीणा है। 'उर्वशी' में दिनकर यह प्रतिष्ठित करते हैं कि शरीर और काम को निंदनीय मानना अध्यात्म की भूल है; मनुष्य की पूर्णता देह को नकारने में नहीं, उसे आत्मा की ओर उन्मुख करने में है। इस काव्य की एक प्रसिद्ध पंक्ति इस संपूर्ण दर्शन का सार है — देह प्रेम की जन्मभूमि अवश्य है, किंतु प्रेम का विस्तार देह की सीमाओं में बँधा नहीं:
यह दृष्टि भारतीय परंपरा के उस गंभीर विवेक से जुड़ती है जो भोग और योग को परस्पर शत्रु नहीं मानता। 'उर्वशी' में दिनकर का सौंदर्य-चित्रण अत्यंत सघन और चाक्षुष है — रवींद्रनाथ ने जहाँ उर्वशी को एक अलौकिक, काल्पनिक छवि के रूप में देखा, वहीं दिनकर की उर्वशी में सौंदर्य के समस्त इंद्रियगम्य आकर्षण साकार हो उठते हैं। उनका प्रकृति-चित्रण भी इसी मादक सौंदर्य से ओतप्रोत है, जहाँ समूचा संसार प्रेम की एक समाधि में लीन प्रतीत होता है:
पुरूरवा का प्रेम केवल वासना नहीं; वह उस असीम की खोज है जो देह के माध्यम से आरंभ होकर देह का अतिक्रमण कर जाती है।
पुरूरवा की पुकार वस्तुतः प्रत्येक मनुष्य की पुकार है — वह सौंदर्य और प्रेम में उस असीम की झलक खोजता है, जिसे पाकर भी मन तृप्त नहीं होता; क्योंकि उसकी प्यास किसी देह की नहीं, अनंत की है।
उल्लेखनीय है कि दिनकर ने यह काव्य तब रचा जब वे अपने जीवन की अर्धशती पूर्ण कर चुके थे — यह परिपक्वता ही 'उर्वशी' को किशोर-प्रेम की भावुकता से बहुत ऊपर उठाकर एक गंभीर जीवन-दर्शन में रूपांतरित करती है। 'उर्वशी' दिनकर के काव्य का वह छोर है जहाँ राष्ट्रीय कवि एक गंभीर दार्शनिक में रूपांतरित हो जाता है। राष्ट्र की मुक्ति का स्वप्न देखने वाला कवि अब मनुष्य की आंतरिक मुक्ति का अन्वेषी बन जाता है।
कोमलता का स्वर: 'रसवंती' और 'द्वंद्वगीत'
जिस कवि को संसार 'ओज का कवि' मानता है, उसी की लेखनी से रसवंती (1939) और द्वंद्वगीत (1940) जैसे कोमल, शृंगारपरक संग्रह भी निकले। यह तथ्य दिनकर की काव्य-प्रतिभा की बहुआयामिता का प्रमाण है। 'रसवंती' में सौंदर्य और प्रेम का चित्रण है, जबकि 'द्वंद्वगीत' में मनुष्य के भीतर चलते निरंतर अंतर्द्वंद्व — कर्तव्य और राग, संयम और आवेग, बहिर्मुखता और अंतर्मुखता के बीच के तनाव — को स्वर मिला है।
ये संग्रह यह सिद्ध करते हैं कि दिनकर का ओज किसी आंतरिक कठोरता से नहीं, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील हृदय से उपजा था। जो कवि भूखे शिशु की पीड़ा से इतना विचलित होता है कि स्वर्ग लूटने का संकल्प कर बैठे, उसका हृदय स्वभावतः कोमल ही होगा। उसका आक्रोश करुणा का ही दूसरा रूप है। इसी द्वंद्व-चेतना का परिपक्व रूप आगे चलकर 'उर्वशी' में प्रकट हुआ।
समकालीनों के बीच दिनकर का स्थान
दिनकर छायावादोत्तर युग के कवि थे — उस काल के, जब निराला, पंत, प्रसाद और महादेवी का छायावाद अपने चरम को छूकर उतार पर था, और कविता यथार्थ तथा राष्ट्रीय चेतना की ओर मुड़ रही थी। इस संक्रमण-काल में दिनकर ने राष्ट्रीय काव्य-धारा को नेतृत्व दिया।
राष्ट्रीय कवियों की परंपरा में उनसे पूर्व माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे कवि थे, जिनमें बलिदान और उत्सर्ग का भाव प्रबल था। दिनकर ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया, किंतु उसमें एक नया आयाम जोड़ा — ऐतिहासिक और पौराणिक आख्यानों के माध्यम से समकालीन प्रश्नों का विवेचन। उन्हें प्रायः रीतिकालीन कवि भूषण के पश्चात वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। किंतु भूषण जहाँ मुख्यतः वीरता का गुणगान करते हैं, वहाँ दिनकर वीरता के नैतिक औचित्य और उसकी सीमाओं पर भी गंभीरता से विचार करते हैं।
दिनकर की एक और विशिष्टता यह थी कि वे सत्ता के निकट रहकर भी सत्ता के आलोचक बने रहे। राज्यसभा-सदस्य रहते हुए उन्होंने संसद में तत्कालीन नेतृत्व की नीतियों की खुली आलोचना की। यह नैतिक स्वातंत्र्य उन्हें केवल एक दरबारी कवि नहीं, बल्कि राष्ट्र का स्वतंत्र विवेक बनाता है।
'संस्कृति के चार अध्याय': इतिहासकार दिनकर
दिनकर की प्रतिभा केवल पद्य तक सीमित नहीं थी। उनका गद्य-ग्रंथ संस्कृति के चार अध्याय (1956) भारतीय सभ्यता के सांस्कृतिक समन्वय का एक विराट विवेचन है, जिस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसमें वे यह प्रतिपादित करते हैं कि सांस्कृतिक, भाषिक और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारत एक राष्ट्र है — क्योंकि समस्त विविधताओं के मूल में एक अविच्छिन्न चिंतन-धारा प्रवाहित है। यह ग्रंथ दिनकर की उस गहन आस्था को दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता अपने मूल में सतत प्रवहमान, आत्मसात करने वाली, किंतु अपनी आत्मा में अखंडित धारा है।
काव्य-शिल्प और भाषा
दिनकर की भाषा का सबसे बड़ा गुण उसकी ओजस्विता और सहज संप्रेषणीयता का दुर्लभ मेल है। वे तत्सम संस्कृत शब्दों का प्रयोग करते हैं, पर इस कौशल से कि वे क्लिष्ट नहीं लगते, बल्कि पंक्ति को गरिमा और गूँज प्रदान करते हैं। उनके बिंब प्रायः प्रकृति, अग्नि, सूर्य, झंझा और समर-भूमि से आते हैं — ऐसे बिंब जो शक्ति और गति का बोध कराते हैं।
छंद पर उनका असाधारण अधिकार था। उनकी पंक्तियों में एक आंतरिक लय है जो उन्हें कंठस्थ करने योग्य बनाती है — यही कारण है कि उनकी अनेक पंक्तियाँ जन-जन की वाणी पर मुहावरों की भाँति चढ़ गईं। साथ ही, 'उर्वशी' में वे यह सिद्ध करते हैं कि यही भाषा कोमल, चिंतनशील और आत्मपरक भी हो सकती है। यह द्विविध सामर्थ्य — रणभेरी और वीणा, दोनों का — हिंदी में विरल है।
काल-रेखा: एक दृष्टि में
दिनकर का रचना-काल भारत के इतिहास के सर्वाधिक निर्णायक दशकों से होकर गुज़रता है — परतंत्रता के अंतिम संघर्ष से लेकर स्वतंत्र भारत के आरंभिक मोहभंग तक।
दिनकर की प्रमुख कृतियाँ और जीवन-घटनाएँ
| वर्ष | घटना / कृति |
|---|---|
| 1908 | सिमरिया, मुंगेर (बिहार) में जन्म |
| 1935 | रेणुका — राष्ट्रीय कवि के रूप में प्रतिष्ठा का आरंभ |
| 1938 | हुंकार — विद्रोह और सर्वहारा-चेतना का उद्घोष |
| 1939–40 | रसवंती, द्वंद्वगीत — शृंगार और अंतर्द्वंद्व का स्वर |
| 1946 | कुरुक्षेत्र — युद्ध-शांति का दार्शनिक महाकाव्य |
| 1952 | रश्मिरथी — कर्ण के बहाने सामाजिक न्याय; राज्यसभा सदस्य |
| 1956 | संस्कृति के चार अध्याय — सांस्कृतिक समन्वय का विवेचन |
| 1959 | पद्म विभूषण; साहित्य अकादमी पुरस्कार |
| 1961 | उर्वशी — काम और अध्यात्म का महाकाव्य |
| 1963 | परशुराम की प्रतीक्षा — पराजय के बाद आत्ममंथन |
| 1972 | 'उर्वशी' पर ज्ञानपीठ पुरस्कार |
| 1974 | देहावसान |
इस काल-रेखा में एक स्पष्ट यात्रा दिखाई देती है — बाहरी संग्राम (परतंत्रता के विरुद्ध) से आंतरिक संग्राम (मनुष्य के अपने अंतर्द्वंद्व) की ओर। आरंभ में असि, अंत में वीणा; आरंभ में राष्ट्र, अंत में आत्मा। किंतु दोनों छोरों पर एक ही मूल चिंता है — मनुष्य की मुक्ति, चाहे वह राजनीतिक हो या आध्यात्मिक।
दिनकर का स्थायी महत्त्व
रामधारी सिंह 'दिनकर' की महत्ता इस तथ्य में निहित है कि उन्होंने कविता को हस्तिदंत-मीनार से उतारकर जनता के संघर्ष और मनुष्य के अंतर्द्वंद्व — दोनों के मध्य खड़ा कर दिया। वे न तो केवल उद्घोषक राष्ट्रवादी थे, न एकांतिक दार्शनिक। वे वह विरल कवि थे जिनमें भीष्म का विवेक, परशुराम का तेज और पुरूरवा की आर्त पुकार — तीनों एक साथ निवास करते थे।
उनकी कविता आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि उसमें उठाए गए प्रश्न शाश्वत हैं — न्याय और शक्ति का संबंध क्या है? शांति कब सद्गुण है और कब कायरता? सत्ता का सच्चा स्वामी कौन है? और मनुष्य की अंतिम मुक्ति किसमें है? जब तक ये प्रश्न मानवता को मथते रहेंगे, दिनकर की वाणी गूँजती रहेगी — कभी रणभेरी बनकर, कभी अंतःकरण की वीणा बनकर।
1974 में जब इस कवि ने संसार से विदा ली, तब हिंदी ने अपना एक ऐसा स्वर खोया जो एक साथ सिंह की दहाड़ और साधक का मौन था। किंतु सच्चे कवि मरते नहीं — वे अपनी पंक्तियों में जीवित रहते हैं। और जब तक कोई हृदय अन्याय के विरुद्ध स्पंदित होगा, या किसी शाश्वत की प्यास में बेचैन होगा, दिनकर वहाँ उपस्थित रहेंगे।