मोहनदास करमचंद गांधी पर लिखना सरल नहीं है। एक ओर उन्हें "राष्ट्रपिता" का आसन दिया गया है, दूसरी ओर उनकी राजनीतिक रणनीति के कुछ निर्णय ऐसे रहे जिनकी क़ीमत हिंदू समाज ने रक्त से चुकाई। यह लेख न भक्ति का है, न घृणा का। यह केवल इतना पूछता है — दस्तावेज़ क्या कहते हैं? और जहाँ प्रमाण चुभता है, वहाँ वह बिना नरमी के सामने रखे जाते हैं।

जिस एकता के लिए इतना त्याग माँगा गया, वह 1947 में रक्तरंजित विभाजन में टूट गई। आदर्श बना रहा, क़ीमत हिंदू समाज ने चुकाई।

साम्राज्य का सिपाही — और निष्ठा का टूटना

यह तथ्य अक्सर भुला दिया जाता है कि अपने जीवन के पहले आधे भाग में गांधी ब्रिटिश साम्राज्य के निष्ठावान समर्थक थे — और उसके युद्धों में सक्रिय सहयोगी भी।

बोअर युद्ध (1899–1902) में उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में लगभग 1,100 भारतीयों की एम्बुलेंस कोर खड़ी की जिसने ब्रिटिश सेना की सहायता की। 1906 के ज़ुलू (बंबाथा) विद्रोह के दमन में उन्होंने फिर स्ट्रेचर-बेयरर कोर बनाई, स्वयं "सार्जेंट-मेजर" का पद धारण किया, और भारतीयों को भर्ती के लिए प्रेरित किया — जबकि उस दमन में हज़ारों ज़ुलू मारे गए। प्रथम विश्वयुद्ध में, और 1918 के दिल्ली युद्ध-सम्मेलन में, उन्होंने सैनिक-भर्ती के प्रस्ताव का "पूरी ज़िम्मेदारी के साथ" समर्थन किया।

इसके पीछे उनका तर्क यह था कि साम्राज्य के प्रति निष्ठा दिखाकर भारतीयों को राजनीतिक रियायतें और स्वशासन मिलेगा। यानी "अहिंसा के पुजारी" ने चार अलग-अलग अवसरों पर साम्राज्य की युद्ध-मशीन को अपनी सेवाएँ दीं — और हर बार उस पक्ष के साथ खड़े रहे जिसके पास सबसे अधिक मारक शक्ति थी।

यह निष्ठा 1919 तक चली। Rowlatt Act और जलियांवाला बाग़ हत्याकांड वह मोड़ बने जहाँ उनका साम्राज्य-विश्वास टूटा। अगस्त 1920 में, असहयोग आंदोलन की शुरुआत के साथ, उन्होंने अपने ब्रिटिश सम्मान — Kaiser-i-Hind स्वर्ण पदक तथा बोअर व ज़ुलू युद्ध के पदक — वायसराय को लौटा दिए।

प्रमाणित — गांधी के अपने पत्र (2 अगस्त 1920, राष्ट्रीय अभिलेखागार) के अनुसार पदक लौटाने का प्रमुख कारण जलियांवाला नहीं, बल्कि खिलाफत था — "अपने मुसलमान देशवासियों की धार्मिक भावना के साथ हुए अन्याय" का हवाला देकर।

निष्कर्ष — आधी ज़िंदगी की साम्राज्य-सेवा एक ओर, और टूटने का क्षण भी एक मुस्लिम-केंद्रित मुद्दे पर — यह स्वयं उनकी प्राथमिकताओं की दिशा बताता है।

खिलाफत — विदेशी धर्म-राजनीति को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना

खिलाफत आंदोलन भारत की स्वतंत्रता से सम्बंधित नहीं था। यह तुर्की के उस्मानी ख़लीफ़ा की सत्ता बहाल करने की एक पैन-इस्लामी मुहिम थी, जो प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की की पराजय के बाद उठी। गांधी ने 1920 में इसे अपना समर्थन दिया, केंद्रीय खिलाफत समिति के सदस्य बने, और नागपुर अधिवेशन में स्वराज की माँग को खिलाफत की माँग से नत्थी कर दिया। विवादित निर्णय

आलोचना का बिंदु स्पष्ट है: गांधी ने एक धार्मिक, सीमा-पार की मुस्लिम मुहिम को भारत के राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन से जोड़ दिया, इस आशा में कि इससे हिंदू-मुस्लिम एकता सधेगी। पर इससे एक ख़तरनाक मिसाल बनी — कि भारतीय मुसलमान की राजनीतिक निष्ठा का केंद्र भारत के बाहर, किसी विदेशी इस्लामी सत्ता में हो सकता है।

सी. शंकरन नायर जैसे नेताओं ने चेताया था। चित्तरंजन दास ने आशंका जताई थी कि लामबंद मुसलमान कहीं अफ़ग़ानों को भारत पर आक्रमण के लिए न बुला लें। ये चेतावनियाँ अनसुनी रहीं। और जब आंदोलन अपने चरम पर था, तब मालाबार में जो हुआ, उसने इन आशंकाओं को सच कर दिखाया।

मोपला — हत्यारों को "बहादुर, ईश्वर-भीरु" कहना

यह इस लेख का सबसे भारी आरोप है, और यह पूरी तरह प्रमाणित है। प्रमाणित

1921 में मालाबार में मोपला (मापिला) मुसलमानों ने हिंदुओं पर भीषण हिंसा की — हज़ारों हत्याएँ, स्त्रियों के साथ बलात्कार, बलात् धर्मांतरण, मंदिरों का विध्वंस। इस रक्तपात के बीच गांधी का रुख़ क्या था?

इसका सबसे विश्वसनीय साक्ष्य किसी पक्षधर स्रोत से नहीं, बल्कि डॉ. भीमराव अंबेडकर की पुस्तक Pakistan or the Partition of India से आता है। अंबेडकर लिखते हैं कि गांधी हिंदू-मुस्लिम एकता के जुनून में इतने डूबे थे कि उन्होंने मोपलाओं और उन्हें बधाई देने वाले खिलाफतियों के कृत्यों को हल्का कर दिखाया।

गांधी ने मोपलाओं को "बहादुर, ईश्वर से डरने वाले मोपला" कहकर वर्णित किया — और हिंदुओं को धैर्य का उपदेश दिया। जब लाशें गिर रही थीं, तब हत्यारों की धार्मिक निष्ठा की प्रशंसा हो रही थी।

यह वाक्यांश उनके अपने Young India के लेखन से है। हिंदुओं को उन्होंने यह संदेश दिया कि उनमें इतना साहस होना चाहिए कि वे "ऐसे धर्मांध विस्फोटों के बावजूद" अपने धर्म की रक्षा कर सकें। इसी रुख़ पर एनी बेसेंट ने New India (29 नवम्बर 1921) में "मालाबार की पीड़ा" शीर्षक से कठोर टिप्पणी की।

एकता का जो आदर्श हिंदू जीवन की क़ीमत पर खड़ा हो, वह आदर्श नहीं, आत्म-समर्पण है।

नोआखली — "मरना सीखो" का उपदेश

अक्टूबर–नवम्बर 1946 में नोआखली (पूर्वी बंगाल) में हिंदुओं पर संगठित हिंसा हुई — हत्या, अपहरण, बलात्कार, गाँवों का दहन।

समकालीन अख़बारी रिपोर्टों के अनुसार गांधी ने सम्मान-हानि के संकट में फँसी स्त्रियों को सलाह दी कि वे समर्पण से पहले ज़हर खाकर या अन्य उपायों से प्राण त्याग दें — आत्मसम्मान बचाने के लिए मृत्यु को उन्होंने एक विकल्प के रूप में सुझाया। यह उपदेश हमलावर के विरुद्ध नहीं, पीड़ित के विरुद्ध जाता है: शस्त्र-संगठन या आत्मरक्षा की व्यवस्था के बजाय "मरना सीखो" का दर्शन एक पूरे समुदाय को निःशस्त्र और निष्क्रिय बना देता है।

संतुलन के लिए — गांधी ने अन्यत्र, Harijan (1 मार्च 1942) में, यह भी लिखा था कि आक्रमण के समय स्त्री का प्रथम कर्तव्य आत्मरक्षा है और उसे नाख़ून-दाँत तक से पूरी शक्ति से लड़ना चाहिए। उनका लेखन विरोधाभासी था।

पर परिणाम — नोआखली के व्यावहारिक संकट में जो संदेश गया, वह प्रतिरोध का नहीं, मृत्यु-स्वीकृति का था — और परिणाम उसी का भुगतना पड़ा।

एकता का आग्रह और बढ़ता राजनीतिक यथार्थ

गांधी का सबसे स्थायी आग्रह "हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई" था। आदर्श के रूप में यह उदात्त है। पर रणनीति के रूप में यह एक गहरी ग़लती साबित हुआ, क्योंकि यह उस राजनीतिक यथार्थ की अनदेखी करता रहा जो उनकी आँखों के सामने आकार ले रहा था।

मुस्लिम लीग और एक संगठित मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद से लगातार द्विराष्ट्र सिद्धांत की ओर बढ़ रहा था — यानी इस घोषणा की ओर कि हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र हैं और साथ नहीं रह सकते। यह कोई गुप्त बात नहीं थी; यह लीग की घोषित राजनीति थी। फिर भी गांधी एकपक्षीय सद्भाव और नैतिक अपील पर टिके रहे, इस विश्वास में कि व्यक्तिगत सद्भावना से इस संगठित राजनीतिक धारा को मोड़ा जा सकता है।

यह स्पष्ट रहे कि आलोचना का निशाना किसी समुदाय के हर व्यक्ति की नीयत नहीं है — ऐसा सामान्यीकरण इतिहास नहीं होता। सीमा-रेखा निशाना गांधी की रणनीतिक भूल है: एक घोषित अलगाववादी राजनीति के सामने उन्होंने प्रतिकार की कोई व्यावहारिक रणनीति नहीं बनाई, केवल भावनात्मक एकता का दोहराव किया। और जब वह राजनीति परिणाम तक पहुँची, तब उनके पास उसे रोकने का कोई उपाय नहीं था।

Direct Action Day और गांधी की घटती प्रासंगिकता

16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग ने, जिन्ना के नेतृत्व में, पाकिस्तान की माँग मनवाने के लिए "Direct Action Day" का आह्वान किया। इसी दिन कलकत्ता में "Great Calcutta Killings" शुरू हुआ, जिसमें हज़ारों लोग मारे गए। यही वह बिंदु था जिसने विभाजन को लगभग अनिवार्य बना दिया।

इस पूरे दौर में गांधी का नैतिक प्रभाव लगभग शून्य हो चुका था — कई इतिहासकारों के शब्दों में, वे एक "असहाय और अप्रासंगिक दर्शक" बन गए थे। दशकों तक "हिंदू-मुस्लिम एकता" का जो आदर्श उन्होंने गढ़ा, वह 1946 की सड़कों पर बिखर गया। आलोचना यहाँ उनकी रणनीति की पूर्ण विफलता पर है: जिस एकता के लिए उन्होंने इतना कुछ माँगा, वह उसी क्षण ध्वस्त हुई जब उसकी सबसे अधिक ज़रूरत थी।

भीतर का दरबार — सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल

गांधी की एक ठोस आलोचना उनके सांप्रदायिक रुख़ में नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर उनके एकाधिकारी नियंत्रण में है — जहाँ बार-बार पार्टी का जनादेश गांधी की व्यक्तिगत पसंद के आगे झुका। प्रमाणित

सुभाष चंद्र बोस 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष बने थे। 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में पुनर्निर्वाचन के समय गांधी नहीं चाहते थे कि वे फिर खड़े हों; उन्होंने अपने समर्थित उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को मैदान में उतारा। सुभाष चंद्र बोस चुनाव जीत गए — सीतारमैया को 205 मतों से हराया। पर गांधी ने इस परिणाम को सार्वजनिक रूप से अपनी व्यक्तिगत हार बताया। इसके बाद सरदार पटेल सहित कार्यसमिति के बारह सदस्यों ने इस्तीफ़ा दे दिया, गांधी ने सहयोग देने से इनकार किया, और ऐसा गतिरोध बना कि अप्रैल 1939 में सुभाष चंद्र बोस को अध्यक्ष-पद से त्यागपत्र देना पड़ा। आगे चलकर उन्होंने फ़ॉरवर्ड ब्लॉक बनाया।

जनादेश सुभाष चंद्र बोस के पक्ष में था, और गांधी की इच्छा उसके विरुद्ध; और इच्छा जीती।

यही पैटर्न 1946 में दोहराया गया, जब दाँव और बड़ा था। आज़ादी की दहलीज़ पर कांग्रेस अध्यक्ष ही अंतरिम सरकार का — यानी भावी प्रधानमंत्री का — मुखिया बनना था। पंद्रह में से बारह प्रांतीय कांग्रेस समितियों ने सरदार पटेल को नामित किया; किसी एक ने भी जवाहरलाल नेहरू को नहीं। फिर भी गांधी के कहने पर पटेल ने अपना नाम वापस ले लिया, और नेहरू निर्विरोध अध्यक्ष — और फिर प्रधानमंत्री — बने। राजेंद्र प्रसाद ने टिप्पणी की थी कि गांधी ने एक बार फिर अपने विश्वस्त सहयोगी को "ग्लैमरस नेहरू" के पक्ष में क़ुर्बान कर दिया।

दोनों अवसरों पर पार्टी का जनादेश एक दिशा में था, और गांधी की व्यक्तिगत पसंद ने उसे पलट दिया। एक व्यक्ति का नैतिक रौब संगठनात्मक लोकतंत्र पर भारी पड़ा — और इसके दूरगामी परिणाम भारत के इतिहास ने भुगते।

विभाजन — "मेरी लाश पर" से समर्पण तक

विभाजन पर गांधी की भूमिका को समझने में सूक्ष्मता ज़रूरी है, क्योंकि वही आलोचना को सबसे धारदार बनाती है।

गांधी ने वर्षों तक विभाजन का खुला विरोध किया। 1940 में उन्होंने कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा। 31 मई 1947 की प्रार्थना-सभा तक वे कह रहे थे कि भले समूचा भारत जल जाए, वे पाकिस्तान स्वीकार नहीं करेंगे, चाहे वह तलवार की नोक पर माँगा जाए।

जिसने "मेरी लाश पर" कहा था, उसने अपनी लाश बिछाने के बजाय प्रस्ताव का समर्थन किया।

पर निर्णायक क्षण में वे डटे नहीं रहे — और यही असली आलोचना है। 3 जून 1947 को माउंटबेटन योजना सामने आई। कांग्रेस कार्यसमिति झुक गई; नेहरू और पटेल ने गृहयुद्ध के भय से इसे स्वीकार कर लिया (पटेल ने इसे "कड़वी दवा," नेहरू ने "बुरा पर अनिवार्य" कहा)। और 14 जून 1947 को जब प्रस्ताव अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सामने आया, तो जिन गांधी ने छह वर्ष "मेरी लाश पर" कहा था, उन्होंने स्वयं सदस्यों से इसे स्वीकार करने का आग्रह किया — यह कहते हुए कि कभी-कभी अप्रिय निर्णय भी लेने पड़ते हैं, और संकेत दिया कि अस्वीकार करने पर "नया नेतृत्व" ढूँढना होगा।

प्रश्न यहीं उठता है। विभाजन रोकने के लिए जो उनका सबसे बड़ा अस्त्र था — जनता को सड़क पर उतारकर सत्याग्रह, या आमरण उपवास, जिसे वे छोटे-छोटे अवसरों पर बार-बार चलाते रहे — वह अस्त्र उन्होंने इस सबसे बड़े संकट पर नहीं चलाया। माउंटबेटन के अपने शब्दों में, विभाजन के समय गांधी "एक बेहद निराश व्यक्ति" थे। इतिहासकार वी. एन. दत्ता ने ठीक ही लिखा कि गांधी के पास जिन्ना की योजना को विफल करने की कोई रणनीति ही नहीं थी।

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निष्कर्ष — आदर्श की क़ीमत

इन सब प्रसंगों से एक ही सूत्र निकलता है। गांधी एकता और अहिंसा को सर्वोच्च आदर्श मानते थे — इतना सर्वोच्च कि उसकी रक्षा के लिए वे बार-बार हिंदू समाज से असीम संयम और प्रतिरोध-त्याग की माँग करते रहे, जबकि संगठित आक्रामक राजनीति के विरुद्ध कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई। मोपला में हत्यारों की प्रशंसा, नोआखली में पीड़ितों को मृत्यु का उपदेश, खिलाफत में विदेशी धर्म-राजनीति का राष्ट्रीयकरण, कांग्रेस के भीतर जनादेश को पलटना, और अंततः विभाजन के क्षण में प्रतिरोध छोड़ देना — ये सब उसी एक दर्शन और उसी एकाधिकारी नियंत्रण के परिणाम थे।

इतिहास निर्मम न्यायाधीश है। यह आलोचना घृणा से नहीं, इतिहास से उपजी है — और इतिहास का तक़ाज़ा यही है कि हम किसी को न देवता बनाएँ, न राक्षस, बल्कि उसके निर्णयों को उनके परिणामों की कसौटी पर तौलें।

स्रोत — डॉ. बी. आर. अंबेडकर, Pakistan or the Partition of India; गांधी के Young India व Harijan के लेख तथा वायसराय को लिखा उनका 2 अगस्त 1920 का पत्र (राष्ट्रीय अभिलेखागार); एनी बेसेंट, New India; 1939 त्रिपुरी अधिवेशन व 1946 कांग्रेस अध्यक्ष-चुनाव के दस्तावेज़ (राजमोहन गांधी, Patel: A Life); तथा 1946–47 की समकालीन अख़बारी रिपोर्टें व विभाजन-कालीन अभिलेख।